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चाणक्य नीति • अध्याय 14 • श्लोक 7
दाने तपसि शौर्यं वा विज्ञाने विनये नये । विस्मयो न हि कर्तव्यो बहुरत्ना वसुन्धरा ।।
हमें अभिमान नहीं होना चाहिए जब हम ये बाते करते है - १. परोपकार २. आत्म संयम ३. पराक्रम ४. शास्त्र का ज्ञान हासिल करना ५. विनम्रता ६. नीतिमत्ता यह करते वक़्त अभिमान करने की इसलिए जरुरत नहीं क्यों की दुनिया बहुत कम दिखाई देने वाले दुर्लभ रत्नों से भरी पड़ी है।
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