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चाणक्य नीति • अध्याय 14 • श्लोक 6
उत्पन्नपश्चात्तापस्य बुध्दिर्भवति यादृशी । तादृशी यदि पूर्वं स्यात्कस्य स्यान्न महोदयः ।।
वह व्यक्ति क्यों पूर्णता नहीं हासिल करेगा जो पश्चाताप में जो मन की अवस्था होती है, उसी अवस्था को काम करते वक़्त बनाए रखेंगा।
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