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चाणक्य नीति • अध्याय 14 • श्लोक 3
बहुनां चैव सत्त्वानां समवायो रिपुञ्जयः । वर्षन्धाराधरो मेघस्तृणैरपि निवार्यते ।।
यदि हम बड़ी संख्या में एकत्र हो जाए तो दुश्मन को हरा सकते है। उसी प्रकार जैसे घास के तिनके एक दुसरे के साथ रहने के कारण भारी बारिश में भी क्षय नहीं होते।
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