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चाणक्य नीति • अध्याय 14 • श्लोक 19
त्यज दुर्जनसंसर्ग भज साधुसमागमम् । कुरु पुण्यमहोरात्रं स्मर नित्यमनित्यतः ।।
कुसंग का त्याग करे और संत जानो से मेलजोल बढाए। दिन और रात गुणों का संपादन करे। उस पर हमेशा चिंतन करे जो शाश्वत है और जो अनित्य है उसे भूल जाए।
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