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चाणक्य नीति • अध्याय 14 • श्लोक 13
यदिच्छसि वशीकर्तुं जगदेकेन कर्मणा । पुरः पञ्चदशास्येभ्यो गां चरन्तीं निवारय ।।
यदि आप दुनिया को एक काम करके जितना चाहते हो तो इन पंधरा को अपने काबू में रखो। इन्हें इधर उधर ना भागने दे। पांच इन्द्रियों के विषय - १. जो दिखाई देता है २. जो सुनाई देता है ३. जिसकी गंध आती है ४. जिसका स्वाद आता है ५. जिसका स्पर्श होता है
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