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चाणक्य नीति • अध्याय 13 • श्लोक 6
यस्य स्नेहो भयं तस्य स्नेहो दुःखस्य भाजनम् । स्नेहमूलानि दुःखानि तानि त्यक्त्वा वसेत्सुखम् ।।
जो व्यक्ति अपने घर के लोगो से बहोत आसक्ति रखता है वह भय और दुःख को पाता है। आसक्ति ही दुःख का मूल है। जिसे सुखी होना है उसे आसक्ति छोडनी पड़ेगी।
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