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चाणक्य नीति • अध्याय 13 • श्लोक 12
बन्धाय विषयासङ्गं मुक्त्यै निर्विषयं मनः । मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ।।
यदि विषय बहुत प्रिय है तो वो बंधन में डालते है। विषय सुख की अनासक्ति से मुक्ति की और गति होती है। इसीलिए मुक्ति या बंधन का मूल मन ही है।
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