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चाणक्य नीति • अध्याय 12 • श्लोक 7
सत्सङ्गाद भवति हि साधुता खलानां । साधूनां न हि खलसंगतेः खलत्वम् ।। आमोदं कुसुमभवं मृदेव धत्ते मृदगन्धं नहि कुसुमानि धारयन्ति ।।
एक दुष्ट के मन में सद्गुणों का उदय हो सकता है यदि वह एक भक्त से सत्संग करता है। लेकिन दुष्ट का संग करने से भक्त दूषित नहीं होता। जमीन पर जो फूल गिरता है उससे धरती सुगन्धित होती है लेकिन पुष्प को धरती की गंध नहीं लगती।
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