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चाणक्य नीति • अध्याय 12 • श्लोक 6
पत्रं नैव यदा करीरविटपे दोषो वसन्तस्य किं नोलूकोऽप्यवलोकते यदि दिवा सूर्यस्य किं दूषणं । वर्षा नैव पतन्ति चातकमुखे मेघस्य किं दूषणं यत्पूर्व विधिना ललाटलिखितं तन्मार्जितुं कः क्षमः ।।
बसंत ऋतू क्या करेगी यदि बास पर पत्ते नहीं आते। सूर्य का क्या दोष यदि उल्लू दिन में देख नहीं सकता। बादलो का क्या दोष यदि बारिश की बूंदे चातक पक्षी की चोच में नहीं गिरती। उसे कोई कैसे बदल सकता है जो किसी के मूल में है।
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