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चाणक्य नीति • अध्याय 12 • श्लोक 3
दाक्षिण्यं स्वजने दया परजने शाठ्यं सदा दुर्जने प्रीतिःसाधुजने स्मयः खलजने विद्वज्जने चार्जवम् । शौर्यं शत्रुजने क्षमा गुरुजने नारीजने धूर्तता इत्थं ये पुरुषा कलासु कुशलास्तेष्वे लोकस्थितिः ।।
वे लोग जो इस दुनिया में सुखी है। जो अपने संबंधियों के प्रति उदार है। अनजाने लोगो के प्रति सह्रदय है। अच्छे लोगो के प्रति प्रेम भाव रखते है। नीच लोगो से धूर्तता पूर्ण व्यवहार करते है। विद्वानों से कुछ नहीं छुपाते। दुश्मनों के सामने साहस दिखाते है। बड़ो के प्रति विनम्र और पत्नी के प्रति सख्त है।
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