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चाणक्य नीति • अध्याय 12 • श्लोक 21
धनधान्यप्रयोगेषु विद्यासंग्रहणे तथा । आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखीभवेत् ।।
जिसे दौलत, अनाज और विद्या अर्जित करने में और भोजन करने में शर्म नहीं आती वह सुखी रहता है।
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