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चाणक्य नीति • अध्याय 11 • श्लोक 7
न वेत्ति तो यस्य गुण प्रकर्ष स तं सदा निन्दति नाऽत्र चित्रम् । यथा किरती करिकुम्भलब्धां मुक्तां परित्यज्य बिभर्ति गुञ्जाम् ।।
इसमें कोई आश्चर्य नहीं की व्यक्ति उन बातो के प्रति अनुदगार कहता है जिसका उसे कोई ज्ञान नहीं। उसी प्रकार जैसे एक जंगली शिकारी की पत्नी हाथी के सर का मणि फेककर गूंजे की माला धारण करती है।
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