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चाणक्य नीति • अध्याय 11 • श्लोक 6
अन्तर्गतमलौ दुष्टः तीर्थस्नानशतैरपि । न शुध्दयति यथा भाण्डं सुरदा दाहितं च यत् ।।
आप चाहे सौ बार पवित्र जल में स्नान करे, आप अपने मन का मैल नहीं धो सकते। उसी प्रकार जिस प्रकार मदिरा का पात्र पवित्र नहीं हो सकता चाहे आप उसे गरम करके सारी मदिरा की भाप बना दे।
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