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चाणक्य नीति • अध्याय 11 • श्लोक 5
न दुर्जनः साधुदशामुपैति बहुप्रकारैरपि शिक्ष्यमाणः । आमूलसिक्तः पयसाघृतेन न निम्बवृक्षौमधुरत्वमेति ।।
एक दुष्ट व्यक्ति में कभी पवित्रता उदीत नहीं हो सकती उसे चाहे जैसे समझा लो। नीम का वृक्ष कभी मीठा नहीं हो सकता आप चाहे उसकी शिखा से मूल तक घी और शक्कर छिड़क दे।
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