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चाणक्य नीति • अध्याय 11 • श्लोक 16
देयं भोज्यधनं सुकृतिभिर्नो संचयस्तस्य व श्रीकर्णस्य बलेश्च विक्रमपतेरद्यापि कीर्तिः स्थिता । अस्माकं मधुदानभोगरहितं नष्टं चिरात्सचितं निर्वाणादिति नष्टपादयुगल घर्षन्यहो मक्षिकाः ।।
एक गुणवान व्यक्ति को वह सब कुछ दान में देना चाहिए जो उसकी आवश्यकता से अधिक है. केवल दान के कारण ही कर्ण, बाली और राजा विक्रमादित्य आज तक चल रहे है. देखिये उन मधु मख्खियों को जो अपने पैर दुखे से धारती पर पटक रही है. वो अपने आप से कहती है " आखिर में सब चला ही गया. हमने हमारे शहद को जो बचा कर रखा था, ना ही दान दिया और ना ही खुद खाया. अभी एक पल में ही कोई हमसे सब छीन कर चला गया"।
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