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चाणक्य नीति • अध्याय 11 • श्लोक 10
अकृष्टफलमुलानि वनवासरितः सदा । कुरुतेऽहरहः श्राध्दमृषिर्विप्रः स उच्यते ।। एकाहारेण सन्तुष्टः षट्कर्मनिरतः सदा । रीतुकालेऽभिगामी च स विप्रो द्विज उच्यते ।।
वही सही में ब्राह्मण है जो केवल एक बार के भोजन से संतुष्ट रहे, जिस पर १६ संस्कार किये गए हो, जो अपनी पत्नी के साथ महीने में केवल एक दिन समागम करे। माहवारी समाप्त होने के दुसरे दिन।
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