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चाणक्य नीति • अध्याय 10 • श्लोक 3
सुखार्थी चेत्यजेद्विद्यां विद्यार्थी चेत्त्यजेत्सुखम् । सुखार्थीनः कुतो विद्या सुखं विद्यार्थिनः कुतः ।।
जिसे अपने इन्द्रियों की तुष्टि चाहिए, वह विद्या अर्जन करने के सभी विचार भूल जाए। और जिसे ज्ञान चाहिए वह अपने इन्द्रियों की तुष्टि भूल जाये। जो इन्द्रिय विषयों में लगा है उसे ज्ञान कैसा, और जिसे ज्ञान है वह व्यर्थ की इन्द्रिय तुष्टि में लगा रहे यह संभव नहीं।
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