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चाणक्य नीति • अध्याय 10 • श्लोक 18
गीर्वाणवाणीषु विशिष्टबुध्दि- स्तथापि भाषान्तरलालुपोऽहम् । यथा सुधायाममरिषु सत्यां स्वर्गड्गनानामधरासवे रुचिः ।।
यद्यपि मैं देववाणी में विशेष योग्यता रखता हूँ, फिर भी भाषान्तर का लोभ है ही। जैसे स्वर्ग में अमृत जैसी उत्तम वस्तु विद्यमान है फिर भी देवताओं को देवांगनाओं के अधरामृत पान करने की रुचि रहती ही है।
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