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चाणक्य नीति • अध्याय 10 • श्लोक 17
का चिन्ता मम जीवने यदि हरिविश्वन्भरो गीयते । नो चेदर्भकजीवनाय जननीस्तन्यं कथं निःसरेत् ।। इत्यालोच्य मुहुर्मुहुर्यदुपते लक्ष्मीपते केवलम् । त्वत्पदाम्बुजसेवनेन सततं कालो मया नीयते ।।
हे विश्वम्भर तू सबका पालन करता है। मै मेरे गुजारे की क्यों चिंता करू जब मेरा मन तेरी महिमा गाने में लगा हुआ है। आपके अनुग्रह के बिना एक माता की छाती से दूध नहीं बह सकता और शिशु का पालन नहीं हो सकता। मै हरदम यही सोचता हुआ, हे यदु वंशियो के प्रभु, हे लक्ष्मी पति, मेरा पूरा समय आपकी ही चरण सेवा में खर्च करता हू।
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