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चाणक्य नीति • अध्याय 10 • श्लोक 13
विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं च सन्ध्या वेदाः शाखा धर्मकर्माणि पत्रम् । तस्मात्‍ मूलं यत्नो रक्षणीयम् छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम् ।।
ब्राह्मण एक वृक्ष के समान है. उसकी प्रार्थना ही उसका मूल है। वह जो वेदों का गान करता है वही उसकी शाखाए है। वह जो पुण्य कर्म करता है वही उसके पत्ते है। इसीलिए उसने अपने मूल को बचाना चाहिए। यदि मूल नष्ट हो जाता है तो शाखाये भी ना रहेगी और पत्ते भी।
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