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चाणक्य नीति • अध्याय 10 • श्लोक 12
वरं वनं व्याघ्रगजेन्द्रसेवितं द्रुमालयं पक्वफलाम्बुसेवनम् । तृणेषु शय्या शतजीर्णबल्कलं न बन्धुमध्ये धनहीनजीवनम् ।।
यह बेहतर है की आप जंगल में एक झाड के नीचे रहे, जहा बाघ और हाथी रहते है, उस जगह रहकर आप फल खाए और जलपान करे, आप घास पर सोये और पुराने पेड़ो की खाले पहने। लेकिन आप अपने सगे संबंधियों में ना रहे यदि आप निर्धन हो गए है।
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