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चाणक्य नीति • अध्याय 1 • श्लोक 13
यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवं परिषेवते । ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवं नष्टमेव हि ।।
जो व्यक्ति कसी नाशवंत चीज के लिए कभी नाश नहीं होने वाली चीज को छोड़ देता है, तो उसके हाथ से अविनाशी वस्तु तो चली ही जाती है और इसमें कोई संदेह नहीं की नाशवान को भी वह खो देता है।
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