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बृहत्संहिता • अध्याय 85 • श्लोक 8
उदङ्मुखः प्राङ्मुख एव वाब्दं कामं यथेारं हृदये निवेश्य । अद्यादनिन्दन् च सुखोपविष्टः प्रक्षाल्य जह्याच्च शुचिप्रदेशे ॥
उरराभिमुख या पूर्वाभिमुख सुखपूर्वक बैठकर वार्षिक याभितिजामा को इदय में रखकर विहित करना चाहिये। फिर दन्तपावन को धोकर पवित्र स्थान में छोड़ देना चाहिये ।
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