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बृहत्संहिता • अध्याय 85 • श्लोक 7
शालेऽश्वकर्णे च वदन्ति गौरवं सभइदारावपि चाटरूषके । वाल्लभ्यमायाति जनस्य सर्वतः प्रियङ्ग्यपामार्गसजम्बुदाडिमैः ॥
शाल और अवकर्ण का दन्तधावन सम्मान को बढ़ाने वाला, देवदारू और यासिका के वृक्ष का दन्तधावन भी सम्मान को बढ़ाने वाला तथा प्रियङ्गु, अपामार्ग, जामुन और दाडिम के वृक्ष का दन्तधावन चारो तरफ से प्रियता की प्राप्ति कराने वाला होता है।
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