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बृहत्संहिता • अध्याय 85 • श्लोक 2
अज्ञातपूर्वाणि न दन्तकाष्ठान्यद्यात्र पत्रैश्च समन्वितानि । न युग्मपर्वाणि न पाटितानि न चोर्ध्वशुष्काणि विना त्वचा च ॥
अपरिचित पत्तों से युत, युग्म (दो आदि) पर्षों में युत, फटा हुआ, वृक्ष पर हो सूखा हुआ यह त्वचा से रहित दतवन नहीं करना चाहिये।
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