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बृहत्संहिता • अध्याय 84 • श्लोक 2
दीपः संहतमूर्तिरायततनुर्निर्वेपनो दीप्तिमान् निःशब्दो रुचिरः प्रदक्षिणगतिर्वैदूर्यहमद्युतिः । लक्ष्मीं क्षिप्रमभिव्यनक्ति सुचिरं यश्चोद्यतं दीप्यते शेषं लक्षणमग्निलक्षणसमं योज्यं यथायुक्तितः ॥
मिलो हुई शिखा वाला, दीर्घ मूर्ति वाला, कम्पनरहित, कान्तियुक्त, शब्दरहित, प्रदक्षिणक्रम से घूमती हुई ज्वाला वाला, वैदूर्य मणि या सुवर्ण के समान ज्योति वाला और बहुत काल तक लगातार प्रज्ज्वलित होने वाला दीप शीघ्र ही प्रभूत लक्ष्मी के आगमन को सूचित करता है। शेष लक्षणों को अग्नि के समान ही यहाँ पर भी समझना चाहिये ।
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