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बृहत्संहिता • अध्याय 64 • श्लोक 3
वैदूर्यत्विद् स्थूलकण्ठत्रिकोणो गूढच्छिद्रश्चोरुवंशश्च शस्तः । क्रीडावाप्यां तोयपूर्ण मणौ वा कार्यः कूर्मो मङ्गलार्थ नरेन्द्रः ॥
वैदूर्य मणि के समान कान्ति वाले, स्थूल कण्ठ वाले, त्रिभुजाकृति वाले, ढके हुये छिद्र वाले या सुन्दर पृष्ठवंश वाले कछुये को राजा द्वारा मंगल के लिये अपने क्रीडावापी या जलपूर्ण मटके में रखना चाहिये।
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