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बृहत्संहिता • अध्याय 63 • श्लोक 2
यवत्रीयो यो वा बदरसदृशो वापि विहगो बृहन्मूर्धा वर्णैर्भवति बहुभिर्यक्ष रुचिरः । स शस्तः संग्रामे मधुमधुपवर्णश्च जयकृद् न शस्तो योऽतोऽन्यः कृशतनुरवः खञ्जचरणः ॥
जिस मुर्गे का कण्ठ जी के समान हो, पके हुये बैर के समान वर्ण हो, बड़ा शिर हो और सफेद, पीला, साल, काला आदि अनेक वर्षों से युत हो तो ऐसा मुर्गा युद्ध में शुभ होता है तथा शहद या प्रमर के समान वर्ण वाला मुर्गा भी युद्ध में विजय प्राप्त कराने वाला होता है। इससे भिन्न वर्ण वाला, दुर्बल शरीर वाला, मन्द शब्द करने वाला और लंगड़ा मुर्गा अशुभ होता है।
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