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बृहत्संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 88
प्राक् प्रग्रहणं यस्मिन् पश्चादपसर्पणं तु तज्जरणम् । क्षुत्शस्त्रभयौद्विग्ना न शरणमुपयान्ति तत्र जनाः ॥
यदि ग्रहण की स्थिति में प्रारंभ मंडल के पूर्व में हो और अंत या मुक्ति पश्चिम में हो तो उसे जरण कहते हैं। इस मामले में प्रभाव यह होगा कि लोग भूख और हथियारों के खतरे से पीड़ित होंगे। लोग व्याकुल हो जायेंगे और उन्हें किसी प्रकार की राहत न मिलेगी।
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