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बृहत्संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 62
यदशुभमवलोकनाभिरुक्तं ग्रहजनितं ग्रहणे प्रमोक्षणे वा । सुरपतिगुरुणावलोकिते तत्शममुपयाति जलैः इवाग्निः इद्धः ॥
ग्रहण के आरंभ या समापन के समय किसी भी ग्रह की दृष्टि के फलस्वरूप जो भी अप्रिय प्रभाव बताए गए हैं, उनकी तीव्रता कम हो जाएगी और यदि बृहस्पति की दृष्टि उस पर पड़ेगी तो वे शुभ सिद्ध होंगे। जैसे जल से धधकती हुई आग बुझ जाती है।
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