सब पूर्वोक्त मुकुट के विस्तार से द्विगुणित दैर्ध्य और विस्तार का आधा पार्श्व का विस्तार होना चाहिये। ये शुद्ध सुवर्ण के बने हों तो श्रेयवृद्धिकारक होते हैं।
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