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बृहत्संहिता • अध्याय 45 • श्लोक 14
नृपतिरपि शुभं शुभप्रदेशे खगमवलोक्य महीतले विदध्यात् । सुरभिकुसुमधूपयुक्तमर्ष शुभमभिनन्दितमेवमेति वृद्धिम् ॥
राजा शुभ प्रदेश में शुभ लक्षणयुत खञ्जन पक्षी की भी देखकर सुगन्धयुत पुष्य और पूपयुत अर्थ देवे। इस तरह करने से सम्मानित शुभ फल की वृद्धि होती है।
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