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बृहत्संहिता • अध्याय 39 • श्लोक 5
तुरगकरिणस्तृतीये विनिहन्याद्यायिनश्चतुर्थे च । भैरवजर्जरशब्दो याति यतस्तां दिशं हन्ति ॥
यदि रात्रि के चतुर्थ प्रहर में निर्यात हो तो गमन करने वालों का नाश करता है तथा जिस दिशा में भग्न भाण्ड की तरह भयङ्कर शब्द जाता है, उस दिशा का भी नास करता है।
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