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बृहत्संहिता • अध्याय 3 • श्लोक 5
उत्तरमयनमतीत्य व्यावृत्तः क्षेमसस्यवृद्धिकरः । प्रकृतिस्थश्चाप्येवं विकृतगतिः भयकृदुष्णांशुः ॥
जब सूर्य उत्तरायण में कुछ देर रहने के बाद अपनी चाल बदलता है तो सर्वत्र समृद्धि आती है और फसलों की वृद्धि होती है। जब वह अपने स्वाभाविक मार्ग पर होगा तो वही परिणाम प्राप्त होगा। परन्तु यदि उसकी चाल में कोई परिवर्तन या संशोधन हो तो वह सम्पूर्ण मानवजाति को भयभीत कर देगा।
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