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बृहत्संहिता • अध्याय 22 • श्लोक 2
तत्रैव स्वात्याद्ये वृष्टे भवतुष्टये क्रमान्मासाः। ब्रावणपूर्वा ज्ञेयाः परिसुता धारणास्ताः स्युः ॥
तत्रैव स्वात्याद्ये वृष्टे भवतुष्टये क्रमान्मासाः। ब्रावणपूर्वा ज्ञेयाः परिसुता धारणास्ताः स्युः ॥२॥ यदि ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष में स्वाती आदि चार नक्षत्रों (स्वाती, विशाखा, अनुराधा और देश) में वृष्टि हो तो क्रम से श्रषण आदि चार मासों (श्रावण, भाद्रपद, आश्चिन और कार्तिक) में अवृष्टि होती है। जैसे ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष में स्वाती में वृष्टि हो तो श्रावण में, विशाखा में वृष्टि हो तो भाद्रपद में, अनुराधा में वृष्टि हो तो आश्चिन में और ज्येष्ठा में वृष्टि हो तो कार्तिक में सृष्टि का अभाव होता है।
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