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बृहत्संहिता • अध्याय 18 • श्लोक 6
शशिनि फलमुदक्स्थे यद् ग्रहस्योपदिष्टं भवति तदपसव्ये सर्वमेव प्रतीप प्रतीपम् । इति शशिसमवायाः कीर्तिता भग्रहाणां न खलु भवति युद्धं साकमिन्दोग्रह क्षैः ॥
ग्रहों के उत्तरगत चन्द्र के जो फल कहे गये हैं, उनके विपरीत फल ग्रहों के दक्षिणगत चन्द्र के होते हैं। इस तरह चन्द्र के साथ ग्रहों या नक्षत्रों के रहने को समागम, रवि के साथ अस्त और कुजादि ग्रहों के परस्पर संयोगादि को युद्ध कहते हैं।
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