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बृहत्संहिता • अध्याय 15 • श्लोक 32
तदुपहतमिति प्रचक्षते प्रकृतिविपर्यययातमेव वा। निगदितपरिवर्गदूषणं कथितविपर्ययगं समृद्धये ॥
इस तरह पीड़ित नक्षत्र पूर्वोक्त अपने वर्ग का नारा और उक्त से भित्र लक्षणयुत हो हो उनकी मृद्धि करता है ।
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