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बृहत्संहिता • अध्याय 15 • श्लोक 10
आर्यम्णे मार्दवशौचविनयपाखण्डिदानशास्त्ररताः । शोभनधान्यमहाधनकर्मानुरताः समनुजेन्द्राः ॥
कोमल हृदय वाले, शुद्ध (दूसरे के धनादि को नहीं चाहने वाले), नीतिज्ञ, पाखण्डी (बेदनिन्दक), दानी, शाखों में निरत, सुन्दर धान्य, अतिशय धनी, कर्म में निरत राजा- ये सब उत्तरफल्गुनी नक्षत्रगत पदार्थ हैं ।
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