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बृहत्संहिता • अध्याय 12 • श्लोक 15
ईषत्प्रभिन्नेऽरुणरश्मिजालैः नैशेऽन्धकारे दिशि दक्षिणस्याम् । सांवत्सरावेदितदिग्विभागे भूपोऽर्घमुर्व्यां प्रयतः प्रयच्छेत् ॥
जिस समय अरुण की किरणों से रात्रि का अंधकार व्याप्त हो जाता है, उस समय राजा को शुद्ध होकर दक्षिण दिशा में पृथ्वी पर तर्पण करना चाहिए।
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