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बृहत्संहिता • अध्याय 11 • श्लोक 41
ध्रुवकेतुः अनियतगतिप्रमाणवर्णाकृतिः भवति विष्वक् । दिव्यान्तरिक्षभौमो भवत्ययं स्निग्ध इष्टफलः ॥
एक और धूमकेतु है जिसे ध्रुव केतु के नाम से जाना जाता है। उसकी गति की दर, रंग, परिमाण और स्वरूप नियमित नहीं है। वह तीनों लोकों में सर्वत्र विचरण करता है। वह कोमल एवं स्पष्ट है तथा शुभ प्रभाव देने वाला है।
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