ॐ अवस्थितिवैशेष्यादिति चेन्नाभ्युपगमाद्धृद्धि हि ॐ ॥
या संसार में जो कुछ दिखाई पड़ता है, उसकी उपमा पर (आत्मा सारे शरीर में व्याप्त हो सकता है) अपने गुण (भाव के) द्वारा।
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