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ब्रह्मज्ञानावलीमाला • अध्याय 1 • श्लोक 6
प्रत्यक्चैतन्यरूपोऽहं शान्तोऽहं प्रकृतेः परः । शाश्वतानन्दरूपोऽहमहमेवाहमव्ययः ॥
मैं अन्तर्यामी चेतना हूँ। मैं शांत (सभी उत्तेजनाओं से मुक्त) हूँ। मैं प्रकृति (माया) से परे हूँ। मैं शाश्वत आनंद स्वरूप हूँ। मैं ही आत्मा, अविनाशी और परिवर्तनहीन हूँ।
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