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ब्रह्मज्ञानावलीमाला • अध्याय 1 • श्लोक 5
शुद्धचैतन्यरूपोऽहमात्मारामोऽहमेव च । अखण्डानन्दरूपोऽहमहमेवाहमव्ययः ॥
मैं शुद्ध चैतन्य हूँ, मैं अपने स्वरूप में ही रमण करता हूँ। मैं अविभाज्य (एकाग्र) आनंद स्वरूप हूँ। मैं ही आत्मा, अविनाशी और परिवर्तनहीन हूँ।
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