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ब्रह्मज्ञानावलीमाला • अध्याय 1 • श्लोक 4
नित्योऽहं निरवद्योऽहं निराकारोऽहमच्युतः । परमानन्दरूपोऽहमहमेवाहमव्ययः ॥
मैं शाश्वत हूँ, मैं दोष रहित हूँ, मैं निराकार हूँ, मैं अविनाशी और अपरिवर्तनीय हूँ। मैं परम आनंद स्वरूप हूँ। मैं ही आत्मा, अविनाशी और परिवर्तनहीन हूँ।
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