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ब्रह्मज्ञानावलीमाला • अध्याय 1 • श्लोक 2
असङ्गोऽहमसङ्गोऽहमसङ्गोऽहं पुनः पुनः । सच्चिदानन्दरूपोऽहमहमेवाहमव्ययः ॥
मैं अनासक्त हूँ, अनासक्त हूँ, किसी भी प्रकार के मोह से सदैव मुक्त हूँ। मैं अस्तित्व-चेतना-आनन्द के स्वभाव का हूँ। मैं ही आत्मा, अविनाशी और सदैव अपरिवर्तनीय हूँ।
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