प्रज्ञानघन एवाहं विज्ञानघन एव च ।
अकर्ताहमभोक्ताऽहमहमेवाहमव्ययः ॥
मैं जागरूकता और चेतना का पुंज हूँ। मैं न तो कर्ता हूँ और न ही अनुभवकर्ता हूँ। मैं ही आत्मा, अविनाशी और परिवर्तनहीन हूँ।
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