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ब्रह्मज्ञानावलीमाला • अध्याय 1 • श्लोक 11
अन्तर्यामिस्वरूपोऽहं कूटस्थस्सर्वगोऽस्म्यहम् । परमात्मस्वरूपोऽहमहमेवाहमव्ययः ॥
मैं आंतरिक नियंत्रक हूँ। मैं अपरिवर्तनीय हूँ। मैं सर्वत्र व्याप्त हूँ। मैं स्वयं ही सर्वोच्च आत्मा हूँ। मैं ही आत्मा, अविनाशी और परिवर्तनहीन हूँ।
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