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भिक्षुगीता • अध्याय 1 • श्लोक 9
जनस्तु हेतुः सुखदुःखयोश्चेत्किमात्मनश्चात्र हि भौमयोस्तत् । जिह्वां क्वचित्सन्दशति स्वदद्भिस्तद्वेदनायां कतमाय कुप्येत् ॥
यदि मान लें कि मनुष्य ही सुख-दुःख का कारण है तो भी उनसे आत्मा का क्या सम्बन्ध? क्योंकि सुख-दुःख पहुँचाने वाला भी मिट्टी का शरीर है और भोगने वाला भी। कभी भोजन आदि के समय यदि अपने दाँतों से ही अपनी जीभ कट जाय और उससे पीड़ा होने लगे तो मनुष्य किस पर क्रोध करेगा?
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