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भिक्षुगीता • अध्याय 1 • श्लोक 8
देहं मनोमात्रमिमं गृहीत्वा ममाहमित्यन्धधियो मनुष्याः । एषोऽहमन्योऽयमिति भ्रमेण दुरन्तपारे तमसि भ्रमन्ति ॥
साधारणतः मनुष्यों की बुद्धि अन्धी हो रही है। तभी तो वे इस मनःकल्पित शरीर को 'मैं' और 'मेरा' मान बैठते हैं और फिर इस भ्रम के फन्दे में फँस जाते हैं कि 'यह मैं हूँ और यह दूसरा।' इसका परिणाम यह होता है कि वे इस अनन्त अज्ञानान्धकार में ही भटकते रहते हैं।
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