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भिक्षुगीता • अध्याय 1 • श्लोक 5
समाहितं यस्य मनः प्रशान्तं दानादिभिः किं वद तस्य कृत्यम् । असंयतं यस्य मनो विनश्यद्दानादिभिश्चेदपरं किमेभिः ॥
जिसका मन शान्त और समाहित है, उसे दान आदि समस्त सत्कर्मों का फल प्राप्त हो चुका है। अब उनसे कुछ लेना बाकी नहीं है। और जिसका मन चंचल है अथवा आलस्य से अभिभूत हो रहा है, उसको इन दानादि शुभकर्मों से अब तक कोई लाभ नहीं हुआ।
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